Sunday, 9 November 2014

बीकानेर गाथा वाया मेरा नाम है चमेली - द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

 

 मित्रो! बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव में छत्तीसगढ़ से फिल्म विशेषज्ञ समीक्षक, टिप्पणीकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल आए थे, उन्होंने ’सिनेमा और हम’ विषयक सत्र में अपना प्रभावपूर्ण सम्बोधन भी दिया था। अपने तीन दिन के उत्सव प्रवास अनुभव को उन्होंनें अपने फिल्मी गॉसिप स्टाइल में बहुत मोहक अंदाज़ में लिखा है। इसकी भाषा न केवल गुदगुदाती है, हास्य-व्यंग्य मिश्रित चुटकियां भी लेती हैं, आप भी पढ़ेंगे तो मान जाएंगे मैं सच कह रहा हूं - नवनीत

 

  बीकानेर गाथा वाया मेरा नाम है चमेली 

 - द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

1

मेरा नाम है चमेली 

 

जब मैं युवा था, एक बचकानी फिल्म आई थी- 'राजा और रंक' जिसमें लता मंगेशकर जी का गाया एक मधुर गीत था : 'मेरा नाम है चमेली, मैं हूँ मालन अलबेली, चली आई मैं अकेली बीकानेर से.' उस अलबेली मालन की प्रतीक्षा में मेरे बाल सफ़ेद हो गए लेकिन उसके दर्शन नहीं हुए. बीकानेर के श्री अशोक गुप्ता ने जब कला एवं साहित्य उत्सव के आयोजन का निमंत्रण दिया तो मन प्रसन्न हो गया, कल्पना बनी कि देश भर के 'फेसबुक' मित्रों से मुलाक़ात होगी और उस अलबेली मालन से भी.

बीकानेर के रसगुल्ले, भुजिया और पापड़ विश्व में प्रसिद्ध हैं, बचपन से हलवाई का धंधा किया है तो ये दूकानें मुझे बरबस आकर्षित करती हैं. बीकानेर जाते समय ट्रेन में एक सहयात्री ने बताया- 'भाई जी, आपने हल्दीराम और बीकाजी का नाम बहुत सुना होगा लेकिन यदि 'बेस्ट क्वालिटी' भुजिया, पापड़ लेना हो तो भुजिया गली में 'बिसनलाल बाबूलाल' की दूकान से लेना.

समारोह स्थल पर उत्सव चल रहा था, कवितापाठ चल रहा था, मैंने अपने मित्र टी.के.मारवाह को पटाया. हम दोनों चुपचाप वहां से खिसके और बीकानेर की गलियों में समा गए. बहुत तलाशे मगर कहीं कोई मालन नहीं मिली, हाँ, रंगीन पत्थरों से बनी नक्कासीदार अटारियों ने हमें मुग्ध कर दिया. कोई परिचय-सूत्र होता तो अन्दर जाकर भी देखते लेकिन क्या करते, बाहर की छटा देखकर ही मन को मनाना पड़ा. सकरी-घुमावदार गलियाँ, उन गलियों से गुजरते नगरवासी, हर मोड़ पर 'ट्रेफिक जाम', हँसते मुस्कुराते लोग- वहां की बात ही कुछ अलग लग रही थी.

पता करते-करते हम लोग सट्टाबाजार पहुंचे जहाँ पराठा-सब्जी की एक मशहूर दूकान थी. उस दूकान को बाहर से देखकर हम दोनों एकबारगी झिझक गए लेकिन उसकी बहुत तारीफ़ सुनी थी इसलिए हिम्मत करके घुस गए. साढ़े तीन फुट के एक गलियारे में मुंहाने पर एक भट्टी पर रखे तवा पर पराठे सेंके जा रहे थे. किसी प्रकार कढ़ाई की कालिख से बचते हुए जब हम अन्दर घुसे तो गली और सकरी हो गई जिसमें एक दीवार से सटी दो 'बेंच' रखी थी जिस पर मनुष्य किसी प्रकार अपना पृष्ठभाग टिकाकर बैठ सके और उसके सामने एक बित्ते की 'टेबल' भी रखी गई थी ताकि जब अखबार के टुकड़े में रखकर पराठा परोसा जाए तो कागज़ टिका रहे. गली में दो फुट की जगह बची थी जिसमें नाली थी और चूँकि वह नाली भरी-पूरी थी इसलिए उसमें से दुर्गन्ध उठ रही थी. उस दूकान में रखा हर सामान ऐतिहासिक 'टच' लिए दिख रहा था अतएव इतिहास का उपहास न हो, हमने उस घिनौने माहौल में भी मशहूर पराठा खाने का निश्चय किया और आलू तथा मूंगदाल के पराठे मंगवाए और केवल पराठे पर ध्यान केन्द्रित कर उसके स्वाद का आनंद लिया. बेशक, पराठे स्वादिष्ट थे और सस्ते भी. चार पराठे के चालीस रूपए दूकानदार ने अपनी छोटी सी लकड़ी की संदूक में जब रख लिए तब मैंने उनसे कहा- 'आपकी शोहरत सुनकर आपकी दूकान आए थे, पराठे तो अच्छे थे लेकिन आपने अपनी दूकान की यह क्या हालत बना रखी है ?' उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिए. मैंने बात आगे बढ़ाई- 'मैंने जैसा आपका नाम सुना था, मेरे दिमाग में आपकी दूकान की जो कल्पना थी, वह कुछ और थी लेकिन यहाँ का हाल देखकर मुझे दुःख हो रहा है.' उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिए. मैंने फिर बात आगे बढ़ाई- 'अगली बार मैं जब बीकानेर आऊंगा तो अपनी 'मेमसाहब' को लेकर पराठा खाने आऊंगा, तबतक इसे ठीक-ठाक करवा लीजिएगा.' उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिए.

उस गली से बाहर निकले, दो बार दाहिने मुड़ने के बाद भुजिया गली पहुँच गए, तनिक खोजने के बाद बिसनलाल बाबूलाल की दूकान दिख गई। वह साढ़े चार फुटी गली में स्थित दूकान थी जिसके प्रवेशद्वार पर एक सज्जन 'काउंटर' के अंदर विराजमान थे। मुझे उनका चेहरा बाद में दिखा और पेट पहले क्योंकि वह उनके चेहरे से एक बित्ता बाहर था। दूकान की गहराई केवल आठ फुट थी। मैं दूकान का क्षेत्रफल देखकर अचंभित हो रहा था और सशंकित भी कि किसी गलत दूकान में तो नहीं घुस गया ! उनसे नाम 'कनफर्म' करने के बाद हम दोनों ने घर ले जाने के लिए भुजिया खरीदी। बाहर निकलते हुए मैंने उनसे पूछा- 'आपका कारख़ाना यहीं आस-पास है क्या ?'
'हें हें हें, बहुत दूर है।'
'सेव बनाने के लिए कितनी भट्ठियाँ हैं ?'
'हें हें हें, हमें क्या मालूम जी !'
'आप मालिक हो और आपको यह नहीं मालूम कि आपके कारखाने में कितनी भट्ठियाँ हैं ?'
'हें हें हें, हम तो वहाँ जाते नहीं जी।'
'मैं इन्कमटेक्स वाला नहीं हूँ, आपका बिरादर हूँ, बिलासपुर से आया हूँ।'
'हें हें हें, वो तो ठीक है जी, हें हें हें।' उन्होंने जवाब दिया और मुंह मोड़कर दूसरे ग्राहकों से जुड़ गए लेकिन इसने प्रयास के बावजूद मैं उनसे भट्ठियों की संख्या नहीं उगलवा पाया।
मैं और मारवाह जी उस सेठ की चर्चा करते एक दूकान पर खड़े-खड़े चाय सुड़की और आटो में बैठकर कार्यक्रम स्थल में वापस आए। वहाँ नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर के शिष्य नाटक की एकल प्रस्तुति कर रहे थे। शुरुआती दो प्रस्तुतियाँ बेदम थी लेकिन अंतिम दो प्रस्तुतियाँ अद्भुत थी, उन प्रस्तुतियों के बारे में बाद में बताउंगा, उस समय तो मेरे दिमाग में पराठा वाला और भुजिया वाला झूल रहे थे। मैं सोच रहा था कि बीकानेर वाले इतना रहस्यपूर्ण व्यवहार क्यों करते हैं ?


समापन कार्यक्रम के दौरान वह रहस्य खुला जब आयोजक श्री अशोक गुप्ता ने एक समीक्षा व्यक्तव्य दिया। पूरा व्यक्तव्य आपके काम का नहीं है, केवल एक वाक्य काम का है। उन्होंने कहा- 'आप सोचते होंगे के अशोक गुप्ता बडा आदमी हे, पेसे वाल्ला है लेकिन ऐसा नई हे। कार बेचणे का धन्दा करता हूँ पर मेरी जेब में एक रूपिया नहीं होवे।'
तब मुझे समझ में आ गया कि बीकानेर का हर धनिक 'कथरी ओढ़ कर घी खाने वाला' है। सब इतने चतुर और सतर्क हैं कि अपनी तिजोरी दूसरे के सामने कभी नहीं खोलते। मैं तो समझ गया, आप समझे कि नहीं ? 




 

2



मेरा नाम है सईद अयूब


35 घंटे की लंबी रेलयात्रा के बाद जब मैं और बिलासपुर के पत्रकार-कृषक श्री बजरंग केडिया अल-सुबह बीकानेर पहुँचे तो सबसे पहले सईद अयूब हमें मिले, चार रातों से जगे हुए थे लेकिन खुश थे। स्टेशन के पास की एक होटल में चाय पिलाकर वे हमें आवास स्थल 'आशीर्वाद' ले गए।

बीकानेर साहित्य और कला उत्सव में बहुत लोग आए थे, चारों तरफ के लोग जिनमें साहित्यकार थे, कलाकार थे, नाटककार थे, चित्रकार थे, फोटोग्राफर थे। नास्ते-चाय और भोजन का काबिल-ए-तारीफ़ इंतज़ाम था। कार्यक्रम स्थल में सहज और सादगी पूर्ण सजावट थी। तीन दिन चले इस महोत्सव में एक भी 'इन्डोर' कार्यक्रम नहीं हुआ, सारे कार्यक्रम आस-पास गुजरती ठंडी हवा और प्राकृतिक प्रकाश में आयोजित हुए। फोटोग्राफ और पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी थी, 'वर्क शाप' चल रहे थे, साहित्यिक पुस्तकों के स्टाल लगे थे। खुली हवा में सांस लेते हुए साहित्यिक कार्यक्रम का आनंद लेना एक अनोखा अनुभव था। आयोजक श्री अशोक गुप्ता हम लोगों की भीड़ देखकर पुलकित थे साथ ही हड़बड़ाए से दिख रहे थे शायद उन्हें ऐसे बड़े मजमे की कल्पना भी नहीं रही होगी।

साहित्यकार और कलाकार आम तौर पर सिरफिरे होते हैं जिसे साहित्यिक भाषा में 'संवेदनशील' कहा जाता है। सिरफिरों की इतनी बड़ी भीड़ को सम्हालना और तीन दिनी कार्यक्रम शान्ति से निपट जाना, सच में, गज़ब हो गया। इस गज़ब-नाक सफलता के पीछे लगभग एक दर्जन बजरंगबलियों की अथक मेहनत थी जिसका नेतृत्व सईद अयूब के हाथों में था। इस युवा की तारीफ़ में 'सईद चालीसा' लिखी जा सकती है। इसको काम के समय नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, गुस्सा नहीं आता। हरदम मुस्कुराते रहता है, हरदम तरोताजा रहता है, हरदम दौड़ते रहता है, हरदम सबसे मिलने के लिए लालायित रहता है, सबकी समस्या का समाधान उसके पास रहता है। सबसे बड़ी बात है कि लड़का कुँवारा है। अपनी बीवी बनाने लायक लड़की खोज रहा है, कुंवारी लड़कियों और उनके फ़िक्रमंद अब्बाओं के लिए यह खुशखबरी हो सकती है। लड़का 'गेरेंटी-शुदा' है, 'जे॰एन॰यू॰' में पढ़ा है, 'यूपीयन' है, अमेरिका के नागरिकों को हिन्दी भाषा पढ़ाता है, कमाऊ पूत है। इच्छुक परिवार डा॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल से संपर्क करें क्योंकि सईद अयूब सिर्फ उनका कहना मानता है और उनके ही निर्देश पर अपने साथियों को लेकर बीकानेर में डेरा डाले बैठा था।

दूसरे दिन दोपहर को सब लोग 'डेजर्ट सफारी' के लिए बस में बैठकर निकल गए, हम देर से पहुंचे तबतक बसें जा चुकी थी लेकिन एक खाली बस को रोककर सईद हम 'लेट लतीफों' का इंतज़ार कर रहे थे. धीरे-धीरे दस लोग अन्तिम खेप के रूप में हम लोग रवाना हुए. रास्ते में सईद ने बातचीत शुरू की जिसमें कुछ उपयोगी और ज्ञानवर्धक सूचनाएं मिली. उपरोक्त कुछ सूचनाएं इसी वार्तालाप के अंश हैं. कुछ और भी आपको बताने लायक है, जैसे, सईद ने घोषित किया- 'मैं ऐसी लड़की से शादी करूंगा जो मेरे जैसे स्वभाव की हो.'
'पति-पत्नी एक स्वभाव के होते ही नहीं सईद भाई.' मैंने कहा.
'मैं शादी के पहले से ही सब बातें साफ़ कर लूँगा.'
'लडकियां बहुत होशियार होती हैं. शादी के पहले वह तुम्हारी हर बात मान जाएगी, शादी के बाद तबला बजाएगी.'
'मैं तो खुले दिमागवाला हूँ, न दबाउंगा और न दबूंगा.'
'मान लो तुम लोगों की आपस में न पटी तो ?'
'तलाक दे दूंगा, मैं भी आज़ाद और वह भी.'
'तलाक दोगे तो लड़की बड़ी रकम वसूलेगी.' मेरे पीछे बैठे व्यक्ति ने धमकाया.
'हम लोगों में यह समस्या नहीं है. शादी के वक्त मेहर की रकम तय होती है, बस, उतना ही देना होता है. मैं तो मेहर की रकम को शादी के समय ही अपनी बीवी के नाम बैंक में जमा करवा दूंगा.' सईद ने अपनी योजना बताई.
सईद अयूब की बात से मुझे समझ में आया कि लड़का दूरदर्शी है, खुले दिमाग का है, साफ़-साफ़ बातें करता है, बीवी को तलाक दे सकता है और एक से अधिक शादियाँ करने का हौसला रखता है. खुदा खैर करे.


इस 'स्मार्ट' बन्दे ने मुस्कुराते हुए इस उत्सव में मेरी जो बाट लगाईं, उसे आगे बताउंगा.........

 



 



3


मेरा नाम है पुरुषोत्तम अग्रवाल

आपने 'मार्क' किया होगा कि कुछ फिल्में किसी कलाकार के नाम से चल जाती हैं। हमारे ज़माने में दिलीपकुमार, राजकपूर, देवानन्द, सुरैया, मधुबाला, नर्गिस के नाम से फिल्में चल जाती थी, वैसे ही मध्यकाल में मेहमूद, साधना, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र जैसे नाम दर्शकों को सिनेमाहाल तक खींच लाते थे। आजकल शाहरुख, सलमान, आमिर, ओमपुरी, परेश रावल आदि अपने नाम से फिल्म हिट करवा लेते हैं उसी प्रकार बीकानेर साहित्य और कला उत्सव प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम से सफल हो गया।

कार्यक्रम आयोजक ने अपने एक भाषण में कहा कि उनके कार्यक्रमों में किसी को भी मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि नहीं बनाया गया लेकिन आयोजन में बड़ी चतुराई से प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल, श्री नरेश सक्सेना, श्री शीन काफ़ निज़ाम, श्री नंद किशोर आचार्य, श्री चंद्र प्रकाश देवल, श्री नंद भारद्वाज, श्री शिवरतन अग्रवाल आदि नामचीन हस्तियों को कभी मंच के उधर, कभी मंच के इधर बैठाकर उन्हें अघोषित 'मुख्य' या 'विशिष्ट' अतिथि बनाए रखा गया। इसका मतलब यह मत लगा लीजिएगा कि ये लोग उस योग्य नहीं थे, ये सब योग्य थे, महायोग्य थे लेकिन आप समझिए कि आयोजकों का दावा कितना हसीन था !

आयोजक अशोक गुप्ता से मेरी मित्रता हाल की है, उनकी 'वाल' पर चिपके हुए 'दिल दहला देने वाले' फ़ोटोग्राफ के आकर्षण में मैं उनकी 'वाल' से लिपट गया और उन्ही मनमोहक चित्रों पर नज़र घुमाते-घुमाते एक दिन अचानक 'बीकानेर साहित्य और कला उत्सव' के बारे में पढ़ा तो मुझे लगा- ' आयोजन अच्छा होना चाहिए, सब आमने-सामने देखेंगे, 'फेसबुक' के परिचित मित्रों से मिलेंगे, कुछ नए मित्र बनाएँगे, अपने आत्मकथात्मक उपन्यास 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' का प्रचार भी करेंगे।'

डर के मारे मैं अपनी पत्नी को साथ बीकानेर नहीं ले गया क्योंकि वहाँ की चित्र प्रदर्शनी में 'ऐसे-वैसे' दृश्यों को उनके सामने कैसे देख पाऊँगा ? इतने सारे लोगों के सामने यदि वे मुझे डाँटती- 'इसलिए यहाँ आए हो?' तो मेरी सार्वजनिक छवि बिगड़ने का अंदेशा था वैसे घर में डांटती हैं तो कोई ख़ास बात नहीं, वह घर की बात घर के अंदर रहती है। 'सौन्दर्य बोध' की आधुनिक अवधारणा की आड़ में सौन्दर्य दर्शन करने की बेखौफ़ हिम्मत मुझमें नहीं है !

'अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो,
ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।'

हाँ, तो मैं आपको प्रो॰पुरुषोत्तम अग्रवाल के बारे में बता रहा था लेकिन इधर-उधर भटक गया। आप मानें या न मानें, इस उत्सव को प्रो॰पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम ने 'हिट' करवा दिया। पुरुषोत्तम जी की ख्याति पूरे हिन्दी जगत में विचारक और प्रभावशाली वक्ता के रूप में है। जब से टेलीविज़न के न्यूज़ चेनल में चर्चा करने के लिए दिखने लगे है तब से उनकी लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। बिना डरे दो टूक टिप्पणियाँ अब बहुत कम सुनने को मिलती है, पुरुषोत्तम जी जब चर्चा में बैठते हैं तो किसी भी विषय पर उनकी संतुलित और सधी हुई बात बरबस मन मोह लेती है। इस उत्सव से उनका जुड़ना- कार्यक्रम का आकर्षण बिन्दु हो गया। न जुड़ने वाले भी इसलिए जुड़ गए कि 'जब प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल जुड़ गए तो मुझे भी जुड़ जाना चाहिए।' मेरा अनुमान कि यह कारवां ऐसे ही कुछ विशिष्ट लोगों के जुड़ जाने की वज़ह से बढ़ता गया और अशोक जी के बोए बीज की फ़सल लहलहा उठी।

पुरुषोत्तम जी से मेरी पहली मुलाक़ात बिलासपुर में 7 अप्रैल 2013 को हुई। वे मेरे द्वारा संचालित संगठन 'विचार मंच' के सौवें कार्यक्रम में अतिथि वक्ता के रूप में 'लोकतन्त्र की विषमताएँ एवं संभावनाएँ' विषय पर अपने विचार व्यक्त करने हेतु पधारे थे। उनके अध्ययन, मनन-चिंतन, नवोन्मेषी दृष्टि और प्रभावपूर्ण वक्तृत्व शैली ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उसी दिन मैं उनका 'फैन' बन गया। 'फेसबुक' में उनसे जुड़ने के बाद उनका मित्रसमूह मुझसे जुड़ा, परिणामस्वरूप मेरी मित्रसूची अनवरत समृद्ध होती गई। ये होता है- किसी समर्थ व्यक्ति से मित्रता स्थापित होने का सकारात्मक प्रभाव। ठीक ऐसा ही लाभ इस उत्सव के आयोजक श्री अशोक गुप्ता को मिला और यह उत्सव एक महोत्सव में परिवर्तित हो गया।

यदि आपकी प्रो॰पुरुषोत्तम अग्रवाल से मुलाक़ात हो चुकी है तो आप भाग्यशाली हैं और यदि नहीं हुई है तो मिलने का कोई जतन कीजिए, किसी व्यक्ति में विद्वता और नम्रता एक साथ हो जाए तो ऐसे व्यक्ति से मिलने का मज़ा कुछ और है। भई, हम सब तो उनसे उत्सव में मिले, उन्हें सुना, उन्हें देखा और 'एक सामान की खरीदी पर एक फ्री' भी हासिल हुआ, हमें उनकी धर्मपत्नी श्रीमति सुमन केशरी के भी दर्शन हो गए, अहोभाग्य।

 

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मेरा नाम है अशोक गुप्ता 

कोई व्यापारी यदि साहित्यानुरागी या कला प्रेमी हो जाए तो समझ लीजिए की उसे खुजली वाला कोढ़ हो गया है जो उसे चैन से नहीं रहने देगा. मैं स्वयं व्यापारियों की ज़मात का हूँ इसलिए श्री अशोक गुप्ता के बारे में इस अभद्र भाषा का उपयोग करने की पात्रता रखता हूँ. बीकानेर साहित्य और कला उत्सव उसी दुखद बेचैनी की सुखद परिणिति है.

जिस व्यापारी में आर्थिक सामर्थ्य होता है वह स्वयं को साहित्यप्रेमी घोषित करवाने के लिए अपने वित्त-सामर्थ्य को काम पर लगाता है और किसी ऐसे 'पैदल' को तलाशता है जो उसको मंच पर स्थापित करें ( अशोक जी ने ऐसा एक प्रयोग करके हमें साक्षात दिखाया ), उसकी जय-जयकार करवाए और नगर हो रही साहित्यिक और कलात्मक गतिविधियों का आधार स्तम्भ बताए. जाहिर है, सब जानते हैं कि 'धन' ही धर्म का आधार है, राजनीति का आधार है, फिल्मों के निर्माण का आधार है, वैसे ही साहित्य और कला के वृहद कार्यक्रमों का भी धन ही आधार है. परन्तु अशोक जी ने अपने बुद्धिचातुर्य से धन-सामर्थ्य-बल के स्थान पर 'फेसबुक' को अपना पैदल बनाया और आप देखिये, यह अद्भुत सम्मलेन घटित हो गया.

अशोक जी एक आदर्श पुरुष हैं, उनसे बहुत कुछ सीखने लायक है। मैंने पूरे उत्सव में उन्हें उत्तेजित होते, चिंतित होते या दौड़ते-भागते नहीं देखा, हाँ, तनिक बेचैन से दिखाई पड़ते थे। इतना बड़ा आयोजन हो तो ऐसी बेचैनी स्वाभाविक है। मैं सबको तो पहचानता नहीं परंतु मैंने वहाँ अनुमान लगाया कि उत्सव में स्थानीय कार्यकर्ताओं की कमी थी और प्रतिभागी ही कार्यकर्ता की भूमिका में अवतरित हो गए थे। अशोकजी की एक 'पोस्ट' से मेरा अनुमान पुष्ट भी हुआ है। यह अशोकजी की विलक्षण नेतृत्व क्षमता का परिचायक है, सीखने लायक है। उन्होंने इस 'पोस्ट' में इन 'दिहाड़ी' वालों को मालदीव घुमाने ले जाने का आश्वासन दिया है जिसे पढ़कर मेरा मन बेहद दुखी हो गया। अब मेरी उम्र 67 वर्ष हो गई है, आस-पास का समझ आता है लेकिन दूर-दृष्टि कमजोर हो गई है अन्यथा मैं दस-बीस कुर्सियाँ इधर-उधर कर देता और अशोकजी के द्वारा प्रायोजित मालदीव-यात्रा-दल की सूची में मेरा नाम भी होता ! सच में, अखर गया।

मैं यह भी जानता हूँ कि इतने बड़े उत्सव में बेतहाशा खर्च होता है, फिर, 'फ्री फंड' वाले भी कार्यक्रम दाँत निपोरते घुस जाते हैं, 'लोकल' तो निःशुल्क थे ही। ज़रूर अशोक जी का 'पर्स' भी हल्का हुआ होगा। 'वन मेन शो' था इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता पर अशोकजी अपनी सज्जनता के कारण अपनी जेब से काफ़ी खर्च हो जाने के बावजूद मुझे उम्मीद है कि अपने मुंह से किसी से कुछ नहीं बताएँगे, स्वयं सह लेंगे। बधाई अशोकजी और भाभी जी। बधाई के पात्र वे सब भी हैं जिन्होंने इस उत्सव में अपनी भागीदारी दी और इसे उत्सव से महोत्सव बना दिया।

अशोक गुप्ता मेरे जैसे व्यापारी और अन्य साहित्य-कार्यक्रम-आयोजकों के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ हो गए हैं जिन्होंने अपने धन का नहीं वरन बुद्धि का प्रयोग करके इस आयोजन को सफल करके बता दिया। मैं तो अत्यंत उत्साहित हो गया हूँ कि ऐसा ही धांसू कार्यक्रम अपने शहर बिलासपुर में भी करूँ, बस, प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल का आसरा मिल जाए और सईद अयूब का सहारा, माँ कसम, बीकानेर से एक इंच ऊँचा कार्यक्रम करके बताऊंगा। किसी साहित्योन्मुखी धनिक की तलाश में हूँ, जैसे ही वह मुझे मिला, मैं गुरु-चेला को पटाता हूँ।

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मेरा नाम है द्वारिका 

 मैं बहुत दिनों से स्वयं को साहित्यकारों की ज़मात में शामिल करवाना चाहता था। कोई भी कितना भी अच्छा लेखक हो, कवि हो, या ये हो या वो हो, जब तक वह पुराने पापियों के बीच घुसकर खड़ा नहीं होता- उसे मान्यता नहीं मिलती। वैसे भी साहित्य में मेरा कोई योगदान नहीं रहा है, पर पिछले वर्ष मेरा उपन्यास 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' प्रकाशक को ढेर सारा रुपया देकर प्रकाशित हुआ तो मेरा दिल भी साहित्यकार कहलाए जाने के लिए मचल गया।मैंने कभी किसी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग नहीं लिया था इसलिए श्री अशोक गुप्ता का 'बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव' मेरे लिए एक ऐसे अवसर के रूप में प्रगट हुआ जिसमें मुझे 'अखिल भारतीय' स्तर पर पहचाने जाने की संभावना दिखी। 

यह बात दूसरी है कि वहाँ मेल-मुलाक़ात का माहौल नहीं बना, सब अपने-अपने समूह में विचरते रहे जैसे- बीकानेरी समूह, लखनवी समूह, जयपुरी समूह, दिल्ली समूह, वृद्ध समूह, युवा समूह, युवती समूह आदि। अधिकतर लोग अपनी लक-दक या मेक-अप दिखाने या उपस्थिति दर्ज़ कराने के लिए आए थे परंतु इसमें गलत क्या है- सब अपनी जेब के पैसे खर्च करके आए आए थे. कुछ लोग अपनी लिखी कविता सुनाने आए थे इसीलिए उनका दिल रखने के लिए आयोजक ने भरपूर लम्बी और बहुत लम्बी काव्य गोष्ठियाँ रखी। उसी प्रकार मैं भी अपने 'एक्सपोजर' के लिए लालायित था।मौका ऐसे मिला कि जब नवनीत पांडे जी ने मुझे 'प्रोफाइल' भेजने के संदेश दिया तो मैंने उत्तर दिया- 'मेरी कोई फाइल नहीं है तो 'प्रोफाइल' कैसे बनाऊँ ?' अब आप बताइये, जिंदगी भर व्यापार किया, अचानक एक पुस्तक छपवा ली तो 'इत्ती' सी उपलब्धि पर भला कोई 'प्रोफाइल' बनती है ? मैंने उस संदेश में एक वाक्य और जोड़ दिया था- 'सिनेमा का मुझ पर प्रभाव' विषय पर बोलने के लिए मुझे तीस मिनट का समय दिया जाए।'25 अक्तूबर की रात को मुझे एक संदेश मिला - 'सर, 3 नवम्बर को 11.30 से 12.00 बजे तक का समय सिनेमा पर आपके व्यक्तव्य के लिए निर्धारित किया गया है। आपके व्यक्तव्य का विषय क्या होगा सर ?'- सईद अयूब, कन्वेनर, बीकानेर आर्ट एण्ड लिटरेचर फेस्टिवल।'आपसे क्या झूठ बोलना, मेरा मन मयूर नाचने लगा। समय कम था, हमें बिलासपुर से 30 अक्टूबर की शाम को बीकानेर के लिए निकलना था, हाथ में पाँच दिन थे और जीवन भर देखी फिल्मों के प्रभाव पर 30 मिनट में बोलना था ! मेरे दिमाग में सौ-पचास फिल्में तैर गई और मैं भटक गया। फिर सईद जी ने संदेश दिया- 'सर, क्या जान सकता हूँ कि कौन-कौन सी फिल्मों के बारे में आप बात करेंगे? बस जिज्ञासावश पूछ रहा हूँ. बुरा मत मानियेगा।' मैंने जवाब दिया- 'फिल्मों की भीड़ ने मुझ पर हमला कर दिया. हर फिल्म मुझसे सवाल कर रही है- अरे, मुझे कैसे छोड़ दोगे ? यह बिलकुल उस तरह है जैसे किसी बच्चे से पूछा जाए- 'तुम किसे ज़्यादा मोहब्बत करते हो, अम्मी को या अब्बा को ? 

आज दिन भर में तय करने की कोशिश करूंगा कि किन फिल्मों पर चर्चा करना मुझे अपने और श्रोताओं के जीवन से जोड़ेगा. कल आपको अवश्य बताउंगा. एक गीत याद आ रहा है- 'इतनी बड़ी महफ़िल और इक दिल, इसको दूं या उसको दूं.'बड़ी मुश्किल से फिल्मों की भीड़ में से छः फिल्म को मैंने चर्चा के लिए चुना, 'श्री 420, 'मदर इंडिया', 'मुगल-ए-आजम', 'दो आंखे बारह हाथ', 'अनाड़ी' और 'आनंद'। इस सभी को मैंने आदि से अंत तक 'यू ट्यूब' में देखा क्योंकि मुझे इन फिल्मों से वे टुकड़े निकालकर 'आडिएन्स' को दिखाने थे जो असरदार थे। तीन पृष्ठ का एक आलेख तैयार किया, एक विशेषज्ञ की मदद से फिल्म के उन टुकड़ों को निकालकर अपने कंप्यूटर में 'सेव' किया, फिर उसे 'पेन ड्राइव' में डाला। 'रिहर्सल' करने के समय मैंने देखा कि प्रस्तुतीकरण में 40 मिनट लगेंगे तो मैंने सईद जी को दस मिनट का अतिरिक्त समय देने हेतु संदेश दिया लेकिन वे संभवतः व्यस्तता के कारण उत्तर नहीं दे पाए होंगे। 

मैं पूरी तैयारी के साथ अपना 'वीडियो प्रोजेक्टर' लेकर बीकानेर पहुंचा। वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि श्री दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (जयपुर) भी इसी विषय में बोलेंगे लेकिन समय, तीस मिनट। इसलिए हम दोनों ने फिल्मों के दृश्य न दिखाने और केवल वार्तालाप प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। फिर, दूसरे दिन मालूम हुआ कि प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक श्री राकेश मित्तल (इंदौर) भी सिनेमा पर बोलेंगे लेकिन समय, वही तीस मिनट ! फिलहाल, हम तीनों ने आपस में बात करके एक योजना बनाई और तीस मिनट की आपसी वार्ता प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।तीसरे दिन 'सिनेमा और हम' विषय पर कार्यक्रम शुरू हुआ, हम तीनों ने अपने विचार रखे। बाईसवें मिनट पर 'डाइस' पर अशोक गुप्ता जी आए और उन्होंने मुझे वार्ता समाप्त करने का इशारा किया, मैंने मध्य में बैठा था, मैंने दुर्गा प्रसाद जी और राकेश जी को उंगली से कोंचा और बात खत्म करने के लिए संकेत किया। उसके बाद श्रोताओं में से एक सज्जन उठे, प्रश्न करना चाहते थे लेकिन समय की कमी थी, मना हो गया। ज़िद करके वे 'डाइस' तक आ गए लेकिन तब भी मना हो गया क्योंकि समय की कमी थी !इस प्रकार केवल बाईस मिनट में भारत के हिन्दी सिनेमा पर तीन विशेषज्ञों की वह चर्चा सम्पन्न हो गई। मेरा अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित होने का वह सुनहरा अवसर समय की कमी की वजह से मेरे हाथ से निकाल गया। मुकेश जी का गाया एक गीत आपको याद होगा :'वो तेरे प्यार का गम, इक बहाना था सनम,अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया।'



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-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

 

Saturday, 8 November 2014

स्मरणीय और यादगार स्मृतियों के साथ पहला ’बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव’ रूपी कला- साहित्य महायज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न



पधारो म्हारै देस! 

बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव 
चित्र: कुंअर रवीन्द्र
 
इस पहली पोस्ट में प्रस्तुत है उत्सव के समापन की अतिथियों व प्रतिभागी मित्रो द्वारा उत्सव में संजोए अनुभवों की उनके द्वारा व्यक्त शाब्दिक अभिव्यक्ति के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट। दूसरी कड़ी में मित्रो के कैमरों की आंखों का कमाल अर्थात उत्सव के विभिन्न सत्रों, मित्रों के नयनाभिराम छायांकन प्रस्तुत करुंगा - नवनीत पाण्डे


स्मरणीय और यादगार स्मृतियों के साथ पहला ’बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव’ रूपी कला- साहित्य महायज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न


शुरुआत फेस बुक मित्र और पत्रकार पंकज मिश्र की इन पंक्तियों के साथ,’


एक गुजारिश ...

हम बीकानेर उत्सव की रपट के लिए बेसबर हुए जा रहे हैं | यह तो सच है कि यह एक अनूठी पहल थी इस लिहाज़ से कि इसमें सिर्फ एक डोर थी जिससे लोग बंधे थे ......डोर भी ऐसी , जो इस उत्सव से एन पहले तक , एक आभासी जगत में आभासी खूंटियों से बंधी थी |

आभासी जगत का वास्तव होना , अनूठा ही तो होता है | अनूठा तो अशोक जी के निमंत्रण का तरीका भी था , अनूठा ये भी कि , इस जश्न में शामिल ज्यादातर लोग एक दूसरे की कलम से वाकिफ थे , कलाम से भी वाकिफ लेकिन सिर्फ लिखे हुए चंद शब्द , अखबारों में शाया शोहरतों के किस्से , पूरी शख्सियत का पता कहाँ देतें है | हाँ , मुलाकातें जरूर इसे मुकम्मल बनाती है , इसे सम्भव कर पाना अनूठा ही तो है |

हालांकि मैं , बिलकुल एक अजनबी था अशोक गुप्ता जी के लिए लेकिन इस उत्सव में शामिल होने के लिए उनके इसरार , आत्मीयता की ऐसी चाशनी में पगे थे कि सिर्फ असमर्थता जाहिर करना भी अपराधबोध सा लगा मुझे जो अब तक साल रहा है |ऐसा न जाने कितनों के साथ हुआ होगा |

इस आत्मकेंद्रित जगत में कोई अजनबी , एक पल को आत्मीयता का कुछ इस तरह अहसास कराए , अनूठा ही तो है | खैर ! उम्मीद है कि उत्सव की रपट भी मेरे जज्बातों से इन्साफ करेंगी ......लेकिन रपट शाया तो हो ......कोई तो करे ......


मित्रो! एक व्यक्ति जिसका कला, साहित्य, संगीत से सिर्फ नाता इतना था कि वह इन से दीवानगी की हद तक अनुराग रखता था । वह कुछ ही समय पहले सोशल मीडीया फेस बुक  से जुड़ा और पाया कि जिन हस्तियों से वह अनुराग रखता है, वें सब इस प्लेटफार्म पर मौजुद है और अचानक उसे के मन एक विचार जन्मा कि आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़ी इन हस्तियों को क्यूं साक्षात एक दूसरे से रुबरु कराया जाए, उसे जो समझ आया उसके अनुसार उसने अपने मन से एक रफ- टफ आयोजन का खाका अपनी वाल पर पोस्ट किया, देखते ही देखते एक के बाद एक मित्रगण इस खाके से जुड़ने लगे और एक परिकल्पना साकार होने लगी। वह आदमी, शख्स थे बीकानेर के समर्थ उद्यमी अशोक गुप्ता और वह आयोजन था ’बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव’ एक ऎसा आयोजन जिस में ग्लैमर तो था लेकिन इस में प्रतिभागी अतिथियों और मित्रों का। यह युवा, कनिष्ठ- वरिष्ठ सभी आमंत्रित व प्रतिभागी मित्रो की सहभागिता के साथ, हर बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त लेकिन किसी भी अव्यवस्था और अनुशासन-भंग जैसी स्थिति से दक्षता और दृढ़ता से निपटने में पूर्णत: सक्षम सब के सामूहिक सद्भाव, स्व प्रेरित प्रयाओं से संभव हुआ एक गरिमामय ऎसा सफल आयोजन जिसकी सोशल मीडीया ही नहीं उससे बाहर भी कला- साहित्य रसिकों, मीडीया की ज़ुबान पर न केवल चर्चाएं भी बल्कि आशंकाएं, और सवाल  भी कि क्या इतने वादों- विवादों से घिर चुका इतने वृहत स्तर पर इतना विशाल रूप ले चुका यह आयोजन सफल हो पाएगा।  बताते हुए गर्व होता है कि सभी शंकाओं, आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए मित्र अशोक गुप्ता की आत्मीयतापूर्ण आचार-व्यवहार की वजह से काफिला बनता गया और उनके दुस्साहसी कदम के साथ कदम मिला उनके सपने को मूर्त करने के साहसिक अभियान में शामिल होते चले गए। 

जैसा कि हर बड़े सफल आयोजन की सफलता के पीछे उस आयोजन का टीम वर्क होता है, इस आयोजन में भी रहा। सोशल मीडीया पर ही अशोक जी का परिचय अनुभव के धनी वरिष्ठ कवि, कथाकार, उपन्यासकार, पूर्व निर्देशक दूरदर्शन व जयपुर फेस्टिवल के सलाहकार दिग्गज नंद भारद्वाज  व दिल्ली के युवा कथाकार और दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर के आयोजन के सफल संयोजन का अनुभव रखनेवाले सईद अय्यूब से हुआ और इनकी उपलब्धियों, इनके अनुभवो को देखते हुए तुरंत इन्हें आयोजन के संरक्षक और कार्यक्रम संयोजन के लिए मना लिया। नंद जी और सईद दोनों ही न केवल कृतित्व अपितु व्यक्तित्व में भी जितने सौम्य और सुमधुर है कि उन पर कोई अंगुली उठा ही नहीं सकता। यह सबसे पहली और बड़ी उपलब्धि थी इस आयोजन की। नंद भारद्वाज और सईद अय्यूब दोनों ही ने अपने आचार- व्यवहार से सम्मोहित सा कर लिया। सईद अय्यूब के साथ उनके दिल्ली के साथी अभिनेता, कवि अभिनव सब्यसाची, युवा कवि संजय शेफर्ड, कवि आनंद कुमार शुक्ल, कवयित्री मृदुला शुक्ला, युवा ब्रजेश कुमार,  पाखी के सह सम्पादक अजय राय, युवा कवयित्री प्रेरणा प्रथम सिंह, वर्धा से आए फिल्म क्षेत्र शोधार्थी कुमार गौरव व अजमेर से निष्ठा परवाह ने जिस समर्पण भाव से वालंटियरिंग का ज़िम्मा संभाला, देखते ही बनता था। कोई सोच भी नहीं सकता कि आयोजन के ये प्रतिभागी, इस रूप में भी दिखेंगे। इसके बाद इस आयोजन को भव्यता के चार चांद लगाए युवा डिजायनर,  अद्भुत प्रतिभा के धनी बीकानेर के युवा गोपाल सिंह और जोधपुर के युवा चित्रकार अमित कल्ला... इन दोनों ने इस आयोजन में रीढ़ की हड्डी का कार्य किया और अतिथियों, प्रतिभागी मित्रो द्वारा लिए गए छाया- चित्रो के भव्य बैक ग्राउंड इसका जीता- जागता प्रमाण है, इस आयोजन का आयोजन स्थल आधुनिक स्थापत्य में बेमिसाल नैतिकता का शक्तिपीठ (आचार्य तुलसी समाधि स्थल, गंगा शहर) जो ट्रस्टी लूणकरण छाजेड़ के सद्प्रयासो के बिना मिल पाना असंभव था। आए हुए सभी अतिथि, प्रतिभागी आयोजन के प्रणेता अशोक गुप्ता के आत्मीय व्यवहार और आवभगत, स्वादिष्ट व्यंजनों से भरपूर भोजन का आस्वादन कर आनंदित व अभिभूत थे। तीन दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला, अधिकतर  अतिथि व प्रतिभागी इस बार रही कुछ छोटी- मोटी कमियों को दूर कर इसे नियमित करने का आग्रह करते भी दिखे। आयोजन में आए अतिथियों व प्रतिभागियों की कुछ प्रतिक्रियांए सचमुच उत्साह बढ़ानेवाली हैं...

नंद भारद्वाज

आयोजन के संरक्षक नंद भारद्वाज ने समापन पर अपने उद्बोधन में कहा,’राजस्‍थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर में विगत 1 से 3 नवंबर 2014 तक आयोजित 'बीकानेर कला एवं साहित्‍य उत्‍सव' का पहला आयोजन अपनी बहुआयामी गतिविधियों के सफल आयोजन के साथ हिन्‍दी प्रदेश के साहित्‍यकर्मियों के बीच अनूठी स्‍मृतियां छोड़ गया है। इस तीन दिवसीय आयोजन के उदघाटन सत्र के साथ ही साहित्‍य, संस्‍कृति और लोकजीवन के प्रति गहरी आस्‍था और रुचि रखने वाले साहित्‍य कर्मियों और कलाकारों ने अपनी रचनाशीलता और अपने साहित्‍य-संस्‍कृति और समय के संजीदा सवालों पर जहां सार्थक संवाद में भाग लिया, वहीं साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं में अपनी रचनाशीलता से रूबरू होने के साथ ही संगीत, नृत्‍य, नाट्य और लोक संगीत की मनोहारी प्रस्‍तुतियों के माध्‍यम से इस आयोजन को एक स्‍मरणीय स्‍वरूप प्रदान किया। सुनेरी छबील फाउंडेशन के कलाप्रिय न्‍यासी श्री अशोक गुप्‍ता की पहल पर फेसबुक मित्र-मंडली द्वारा आयोजित इस पहले अनूठे आयोजन में हिन्‍दी, उर्दू और राजस्‍थानी भाषा के अनेक साहित्‍यकारों ने तो भाग लिया ही, भारतीय संगीत, नृत्‍य, रंगकर्म, चित्रकला, फिल्‍म और लोक कलाओं में गहरी रुचि रखने वाले कलाकर्मियों ने भी इस आयोजन में उत्‍साह से भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने इस तीन दिवसीय अनुुष्‍ठान में विचार-गोष्ठियों, काव्‍य-पाठ के आयोजनों और संगीत-नत्‍य-नाट्य एवं लोक संगीत की प्रभावशाली प्रस्‍तुतियों के माध्‍यम से इस आयोजन को स्‍मरणीय बनाने में अपूर्व योगदान किया।"

अरुणदेव

कवि, समालोचन वेब पत्रिका सम्पादक अरुणदेव लिखते हैं, ’बीकानेर में कला के लिए जगह है और जिज्ञासा भी. इस मझोले नगर में व्यक्तिगत रूप से बने हुए ‘खुले- आडिटोरियम’ को देख कर आप अंदाज़ा लगा सकते है. यह तब और पुख्ता हुआ जब मणि मधुकर के एक कमजोर नाटक ‘दुलारीबाई’ का मंचन स्थानीय कलकारों ने इतने बेहतरीन ढंग से किया कि वह दर्शनीय बन पड़ा. कमाल की अदायगी. यह सब कलाकार शौकिया थे फिर भी. निर्देशन सुधेश व्यास का था.कुतले खान को रेत के बीचों बीच खुले असमान के नीचे मशालों की रौशनी में सुनना अद्भुत तो था, पर उन पर टीवी के लाइव शो के थोड़े दुष्प्रभाव भी दिखे. चिंता हुई. लोक कलाकारों को मुंबई निगल रहा है. 

रेत के एक टीले पर बैठकर सिद्धेश्वर सिंह, प्रेमचंद गाँधी और कुँवर रवीन्द्र के साथ डूबते सूरज का दृश्य ‘रस सिक्त’ करता रहा. 

खुली जीपों में यात्रा का अपना रोमांच तो था ही.

मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव की पुत्री रचना यादव का कथक सच में बेजोड़ था, उन्होंने अपना बेहतरीन दिया.

‘संस्कृति – साहित्य और समय’ परिचर्चा का एक ‘सूत्राधार’ मैं भी था – यह विषय प्रो. पुरुषोतम अग्रवाल का अपना पसंदीदा विषय है और उनकी इस पर गहरी पकड़ है – वे जम कर बोले और सत्र को जीवंत बना दिया – नरेश सक्सेना ने भले ही यह कहा कि आप पूछे चाहे जो पर मैं उत्तर तो वही दूंगा जो मुझे देना है – पर घेर- घार कर वह भाषा पर लाये गए और वहीँ टिके भी रहे. दीपक कबीर ने थोड़ी गर्मी पैदा की जो चाहिए भी थी. प्रश्नों की भारी बरसात में प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल और नरेश सक्सेना के उत्तर रूपी छाते बड़े काम आये, कुल मिलकार सत्र जम गया.

‘कहानी : क्या क्यों और कैसे’ के सत्र में मालचंद्र तिवाड़ी के साथ मैं भी एक वक्ता था – और उसी समय ‘कविता : क्या क्यों और कैसे’ का भी सत्र चल रहा था. ‘कहनी में मैं क्यों ?’ सबसे पहले तो मैंने यही पूछा. जवाब यह मिला कि – ‘आप क्योकि समालोचन में कहानियां छापते हैं तो आप बताइए कि क्या कसौटी है आप की. वह तो मालचंद्र तिवाड़ी थे जिन्होंने सत्र संभाल लिया – खैर. मैंने देखा कि दर्शकों में पुरुषोतम अग्रवाल जी भी हैं – थोड़ी देर में चले गए. बाद में मिले तो कहा कि तुम्हारा यह सत्र रोचक था पर कविता वाला सत्र ज्यादा रोचक था. होना भी था नरेश जी बोलते बहुत अच्छा है.

तीसरे दिन सुबह नन्द किशोर आचार्य, नंद भारद्वाज, सुमन केशरी, विमल कुमार, प्रेमचंद गाँधी, नादिरा बब्बर, प्रोमिला क़ाज़ी, नीलम मैन्दिरत्ता, प्रेरणा प्रथम सिंह के साथ मुझे भी कविता पढनी थी. खुशनुमा सुबह थी – और पहला सत्र होने के कारण श्रोता भी सह्रदय बने हुए थे. प्रेमचंद गाँधी के संचालन में कविताएँ धैर्य से पढ़ी गयी और सुनी भी गयी. इस सत्र की उपलब्धि नादिरा बब्बर थी – उन्होंने तीन सुंदर कवितायेँ उम्दा ढंग से पढ़ी. नरेश जी देर से आये और काफी लोग तब तक निपट गए थे – बाद में उन्होंने मुझसे कहा कि कही किनारे बैठते हैं – उन्हें एक कविता मैंने अपनी सुनाई.

अशोक गुप्ता जी ने बेहतरीन इंतजाम किया था – जब एक घरेलू बर्थ –डे पार्टी में इतनी दुश्वारियों का समाना करना पड़ता है तब ऐसे में इतने विस्तृत, बहुविध और ज़ोखिम भरा आयोजन करना साहस की बात है. ऐसे सह्रदय नागर हर नगर से सामने आने चाहिए. नवनीत पाण्डेय, सईद अयूब, आनंद कुमार शुक्ल, विष्णु तिवारी और कई जगहों से पधारे मित्रों ने बड़ी मेहनत से इसे इस अंजाम तक पहुँचाया.

प्रेमचंद गांधी

एक ही टेर बीकानेर बीकानेर रूप में लिखी कवि, संस्कृति आलोचक प्रेमचंद गांधी ने अपने अनुभव कुछ यूं बांटें.....  

  "लंबी-छोटी सुगम-दुर्गम यात्राएं कर लगभग सभी मित्र-मित्राणियां घर पहुंच चुके हैं। मेरे लिए बीकानेर की यह यात्रा अपने स्‍तर पर मेलमिलाप और उत्‍सव-आनंद के लिए थी। लेकिन अशोक गुप्‍ता, सईद अयूब, नंद भारद्वाज और नवनीत पांडे आदि मित्र-आयोजकों ने इसमें कला और रचनात्‍मकता का जो वातावरण तैयार किया, उसने इस उत्‍सवी आनंद को कई गुना बढ़ा दिया। जैसे दिल्‍ली के विश्‍व पुस्‍तक मेले में देश भर के लोगों से मेल-मिलाप होता है, वह रचनात्‍मक सरोकारों से जुड़े सत्रों के कारण आपको भीतर से और भर गया हो... 

नरेश सक्‍सेना, नंद किशोर आचार्य, नादिरा ज़हीर बब्‍बर और पुरुषोत्‍तम अग्रवाल से मिलना और उनको सुनना एक विरल अनुभव रहा... अरुण देव, कुंवर रवींद्र, विमल कुमार के साथ कई परिचित-अपरिचित मित्रों से मिलना सुखद रहा।

सब मित्रों को छूट ह‍ै कि बीकानेर की जिन तस्‍वीरों में वे मुझे अपने कैमरों और मोबाइल फोन में कैद कर लाए हैं, यहां फेसबुक पर आराम से टैग कर सकते हैं। जिस खुले दिल से हम गले मिले, हाथ मिलाया, खूब बातें की, वे सब क्षण यहां फिर से जी सकें...

आभासी दुनिया को ज़मीन पर कहकहों में बदलने वाली तस्‍वीरें मोहब्‍बतों का नया सिलसिला है....

एक ख़ास बात यह कि बीकानेर के इस आयोजन में मुझे एक जोड़ी आंखें ऐसी दिखीं, जिनमें मैं अपनी एक पुरानी दोस्‍त-प्रेमिका को तलाशता रहा... कई बार सोचा कि कह दूं, लेकिन संकोच में नहीं कह सका... ये आंखें बहुत कमाल करती हैं प्रेम बाबू..."

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

 समीक्षक, आलोचक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की यह अनुभूति सब कुछ बयान कर देती है ,’

बहुत सारे संशयों और आशंकाओं को निर्मूल साबित करता हुआ तीन दिवसीय बीकानेर साहित्य और कला उत्सव सानंद सम्पन्न हो गया. अगर तलाश करना चाहेंगे तो इस आयोजन में जितनी चाहे उतनी कमियां तलाश कर लेंगे, और हो सकता है कि कुछ मित्रों को ऐसा करके प्रसन्नता भी हो, लेकिन मैं निस्संकोच कह सकता हूं इस आयोजन ने मन में जो सुखद स्मृतियां छोड़ी हैं वे न भूतो न भविष्यति हैं. पहली बात तो यह कि यह आयोजन न तो सरकार का था, न किसी संस्था का और न कॉर्पोरेट जगत का. किसी जाने-माने साहित्यकार का भी यह आयोजन नहीं था. एक कामयाब व्यापारी, जो उसी के साथ हद दर्ज़े का कला रसिक भी है, अचानक एक आयोजन करने का फैसला करता है और जैसे उस शे'र में कहा गया है - लोग साथ आते जाते हैं और कारवां बनता जाता है. Ashok Gupta जी के प्रति अपने गहरे अनुराग के बावज़ूद कम से कम मुझे तो सपने में भी यह कल्पना नहीं थी कि यह उत्सव इतने बड़े पैमाने पर और इतनी शानदार कामयाबी के साथ सम्पन्न हो जाएगा! बस, अशोक गुप्ता ने तबीयत से एक पत्थर उछाला और आसमान में सुराख हो गया. देश भर से साहित्यकार, कलाकार और रसिक जन जुटे और पूरे तीन दिन अहर्निश रस पान करते रहे. नरेश सक्सेना, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुमन केशरी, शीन काफ़ निज़ाम, नन्द किशोर आचार्य, श्रीलाल मोहता, नादिरा बब्बर आदि जैसे जाने-माने नामवर और गुणीजन सहज सुलभ रहे. अमित-असित की जोड़ी ने सितार सरोद के जुगलबन्दी से मंत्रमुग्ध किया तो रचना यादव (राजेन्द्र यादव मन्नू भण्डारी की सुपुत्री) ने अपने कथक से चमत्कृत किया. कुटले खान ने धोरों पर राजस्थानी लोक संगीत का जो जादू जगाया, वह तो शब्दातीत था. और भी बहुत कुछ हुआ. उसपर मैं भी चर्चा करूंगा, और मित्रगण भी करेंगे. अभी तो सिर्फ इतना ही कि मित्रवर अशोक गुप्ता जी ने अपने उद्यम से, अपने जुनून से और अपने जज़्बे से एक बार फिर यह साबित किया है अगर ठान लें तो कुछ भी नामुमकिन नहीं! मैं उन्हें और उनकी पूरी टीम को, और साथ ही सारे प्रतिभागियों को नमन करता हूं और यह उम्मीद करता हूं कि बीकानेर से यह जो सार्थक शुरुआत हुई है उसकी प्रतिध्वनि पूरे देश में सुनाई देगी. 

संजय शेफर्ड

युवा कवि संजय शेफर्ड का अनुभव,"सपनों की दुनिया बहुत ही अजीब और अनोखी होती है। उतनी ही अजीब जितनी आंखों में नींद, आभाषी दुनिया में जगह तलाशती वास्तविकता की जड़ें। उतनी ही अनोखी जितनी खाली हृदय के पोर- पोर में बहती हुई संवेदनाओं की विस्तृत जमीन, भावनाओं की समंदर जैसी गहराई, अपनत्व का नभ से भी ऊंचा आकाश, आत्मीयता की परिधि में केंद्रित होते तर-बतर रिश्ते। समझ में नहीं आ रहा है कि बीकानेर उत्सव को किस रूप में परिभाषित करूं, समझ में नहीं आ रहा है कि अपने अग्रजों के प्रति कैसे आभार प्रस्तुत करूं, समझ में नहीं आ रहा है देश- विदेश से आए उन कलाकारों को क्या भेंट करूं, समझ में नहीं आ रहा है कि उन तमाम अपनों को किस गांठ में पिरो दूं जो चाहे- अनचाहे में ही सही आत्मा से आत्मा का एक रिश्ता जोड़ गए। 

आयोजन समिति का अहम् हिस्सा होने के नाते पूरे सप्ताह भागमभाग की स्तिथि बनी रही, बहुत सारे कार्यक्रम देखने से भी वंचित रह गया। लेकिन गाहे- बगाहे उनके दिलों में झांकने की कोशिश जरूर किया, उनके हृदय- आत्मा की जमीं को छूने का प्रयास जरूर किया। हमने उन भावनाओं, उन संवेदनाओं को जरूर पढ़ा जो कला, साहित्य, संस्कृति को देखने- समझने आईं थीं और अशोक गुप्ता के माध्यम से हम सबके दिलों में आत्मीयता की एक बहुत ही गहरी छाप छोड़ गईं। सही मायने में यह कला व साहित्य के साथ- साथ गहरे रूप से आत्मीयता का उत्सव था। जिसमें शब्द से ज्यादा भावनाएं महत्वपूर्ण बनती दिखीं, जिसमें साहित्य से ज्यादा संवेदनाएं हावी रहीं, जिसमें हमने पेंटिंग को पढ़ने के साथ- साथ चेहरों को पढ़ना सीखा, और आभाषी दुनिया से निकल वास्तविक रिश्तों का सृजन किया। 

मीडिया, साहित्य और शोध के क्षेत्र में आने के बाद भारत भ्रमण किया, सात देशों में घूमा, दो सौ से ज्यादा कार्यक्रमों का हिस्सा बना लेकिन यह मेरे जीवन का पहला ऐसा आयोजन था जिसमें मुख्य अतिथि भी दर्शकों के लिए कुर्सियां लगा रहा है। एक कलाकार जिसे कुछ देर बाद अपनी परफॉरमेंस देनी है। चाय, पानी ले जा रहा है, होर्डिंग और बैनर लगा रहा है। इस बात में भी तनिक संदेह नहीं कि हम और हमारी व्यवस्थाओं में कई चूक नज़र आई पर आप सभी ने जिस तरह से संभाला और आयोजन को अपना बनाया उसके लिए हम सब के पास शब्द नहीं है। इस आयोजन के लिए बीकानेर कला उत्सव की अपनी पूरी टीम जिसमें अशोक गुप्ता, सईद अयूब, गोपाल सिंह, नन्द भारद्वाज, नवनीत पाण्डेय, आनंद कुमार शुक्ल, अभिनव, अजय राय, प्रेरणा प्रथम सिंह, मृदुला शुक्ला, कुमार गौरव की पूर्ण निष्ठा और समर्पण को देखकर एक बार फिर से विश्वास प्रबल हुआ। सोशल मीडिया से जुड़े तमाम दोस्तों की भूमिका भी बहुत ही सशक्त रूप में सामने आई। यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार की कोई पहले से दिशा निर्देश तय नहीं किए थे लेकिन गूगल पर मौजूद दुनिया भर की पोस्ट इस बात की गवाह है कि किस तरह आपने इसे हाथोहाथ लिया है। 

सचमुच एक सफल आयोजन में जो कुछ भी होना चाहिए बेहद ही सहज रूप में हुआ। एक ऐसा आयोजन जिसमें पुरुषोत्तम अग्रवाल जैसी शख्सियत मौजूद हो, नरेश सक्सेना जैसे कवि का पाठ हो रहा हो, शीन काफ़ निज़ाम अपनी गजल पढ़ रहे हों, रचना यादव की कत्थक की सम्मोहक प्रस्तुति हो, सुमन केशरी कविता पर चर्चा कर रही हों, कुतले खान की एड़ियों से लेकर माथे तक कम्पन पैदा कर देने वाली संगीत की शाम हो, विमल कुमार जैसे कवि और पत्रकार हों, पद्मश्री चंद्रप्रकाश देवल जैसा साहित्यकार हो, नादिरा जहीर बब्बर जैसी नाटककर्मी हों, अमित- असित गोस्वामी बंधू का सरोद वादन हो, कल्बे कबीर की परिचर्चा हो, सुदेश व्यास का नाटक, कुंवर रविंदर, अमित कल्ला, रोहित रसिया, विनय अम्बर, इरा टाक जैसे कलाकार हों, संजय पुरोहित जैसे संचालक, सईद अयूब व गोपाल सिंह जैसे सौम्य व सशक्त संयोजक तथा अशोक गुप्ता जैसा संजीदा और हर हाल में सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाला इंसान हो उसके सफल होने की सार्थकता में लेस मात्र भी संदेह एक तरह से बेमानी ही होगी। 

सचमुच यह ज्ञान के साथ-साथ आत्मिक उत्सव था। आयोजन को पूरा हुए दो दिन हो गए हैं। लेकिन बहुत सारे चेहरे अभी भी दिखाई दे रहे हैं। ऐसे लग रहा है कि अरुण देव आकर हमारे कंधे पर हाथ रखेंगे, प्रेमचंद गांधी की खिलखिलाती हंसी गूंजेगी, मां समता, प्रोमिला काजी, नीलम मेहंदी रत्ता आसपास ही कहीं दिख जाएंगी, कुंवर रविन्दर की सहृदयता झलक जाएगी, अमेरिका से आई लुईस सारे सीमाओं की परवाह किये बगैर गले से लिपट जाएगी, थोड़ी देर बाद सुमन केशरी दी की आवाज सुनाई देगी - अभी तक लंच नहीं किया ? आनंद दिर्वेदी मुस्कराते दिखाई देंगे, नूतन गैरोला व सुशीला शिवराण का स्नेह बरस पड़ेगा, निष्ठा, नेहा, भूमिका, अजय, गौरव और प्रेरणा चिल्लाएंगी की अपना एसाइन काम अभी तक नहीं पूरा किया। सचमुच यह तीन दिन बेहद ही अपनत्व और आत्मीयता का पर्व था, जिसमें हम सब एक तरफ संस्कृति को समझने और परिभाषित करने की कोशिश कर रहे थे, दूसरी तरफ यह कोशिश हम सभी के दिलों में संवेदना और भावना के रूप में बह रही थी।

अशोक गुप्ता जी आपके सपने को जो हम सबका भी सपना था, हम सबने मिलकर सच कर दिखाया है। और अब यह हम सबका सपना है।

प्रेरणा प्रथम सिंह

युवा कवयित्री प्रेरणा प्रथम सिंह कहती हैं,"पिछले चार दिन कैसे बीते, मालूम नहीं। मेरी ज़िन्दगी के अब तक के सबसे खूबसूरत दिनों में से एक रहे हैं ये। कला, साहित्य एवं संगीत के इस उत्सव में कैसे जादू चला कि अब तक नशा उतरा नहीं है। भाग दौड़ से लेकर अब तक की बेहतरीन संयोजक समिति के साथ काम करना एक लाजवाब अनुभव रहा। ऐसा अनुभव रहा कि मुझ जैसा कम्पल्सिव फोटोग्राफर फोटो खींचना भूलकर कामों में ऐसा खोया कि एक तस्वीर तक ना खींची। फ़ोन कहाँ रहता था पता ही नहीं, इसलिए इस बीच जिनके कॉल्स एवं मेसेजेस का जवाब ना दे पायी होऊं, उनसे क्षमा। दिग्गजों से मिलना और उनके साथ उठना बैठना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव रहा। ख़ुशी तब और भी बढ़ गयी जब पता चला कि कविता पाठ में मुझ से नाचीज़ को भी शामिल किया गया है वह भी सुमन केशरी, नन्द भारद्वाज, नन्द किशोर आचार्य, नादिरा बब्बर जैसे दिग्गजों के साथ एक ही मंच पर। कसम से, इस बार का यह उत्सव अपने आप में यादगार रहेगा। पूरी रिपोर्ट जल्द ही साझा करूंगी, यहाँ वहां से तसवीरें इकट्ठी करके। और जिन लोगों के पास तसवीरें हो वो जल्द से जल्द भेजें (अनुरोध है छोटा सा) । चंद छोटी छोटी बातें- Ashok Gupta जी का यह साहसिक फैसला आने वाले समय में लोगों को प्रेरणा देता रहेगा कि- "कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों"। यह मौका देने का बेहद शुक्रिया आपका। आने वाले अंतर्राष्ट्रीय आयोजन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा। Sayeed Ayub जी के निर्देशन के बिना मेरे लिए यह संभव नहीं था। जितनी मेहनत पूरी टीम ने की, यह एक सामूहिक प्रयास का ही नतीजा था।

कुमार गौरव

बीकानेर एवं कला साहित्य उत्सव आभासी दुनिया के रंगों का कोलाज 1 में युवा कुमार गौरव कहते हैं, "१ से ३ नवंबर तक चलने वाले बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव में कला के विविध रूपों से साक्षात्कार हुआ..एक ऐसे दौर में जब उत्सवों की बाढ़ सी आ गई है वहाँ इस तरह का आयोजन एक सकारात्मक आगाज़ है.....उत्सव में देश-विदेश से आए ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के रंग उकेरे..साहित्य एवं कला क्षेत्र के प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों ने विविध पक्षों पर अपने विचार रखे..करीब पांच माह पूर्व उत्सव के अध्यक्ष अशोक गुप्ता जी ने जब उत्सव के की संकल्पना बताई थी तभी मुझे इस उत्सव के प्रति उत्सुकता जाग गई थी यहाँ आने के पश्चात इतने अनुभुवों को मैंने जिया और इतनी यादों को साथ लिए जा रहा हूँ जो जीवन भर साथ रहेंगे.....धन्यवाद अशोक गुप्ता, सईद भाई, गोपाल, नवनीत जी का जिन्होंने मुझे उत्सव में जिम्मेदारी सौंपी ..उत्सव में आये अतिथियों से विभिन्न विषयों पर चर्चा करने का अवसर भी मिला द्वारिका प्रसाद जी, पुरुषोत्तम अग्रवाल सर , दुर्गा प्रसाद अग्रवाल जी एवं अन्य .. मैं आपको कभी निराश नहीं करूँगा अशोक जी और ऐसे आयोजन हम मिलकर करते रहेंगे और रंगों का कोलाज बनाते रहेंगे... 

निष्ठा परवाह

अजमेर से आयी युवा कवयित्री निष्ठा परवाह कहती है,"चार दिन बाद आज वापस बीकानेर से अजमेर.... कई सारे साहित्यिक कार्यक्रमों के अलावा कुतले खां और कत्थक नृत्यांगना रचना यादव की शानदार प्रस्तुति बहुत दिनों तक याद आती रहेगी... बहुत सारे फेसबुक दोस्तों से पहली बार मिलकर बहुत अच्छा लगा... Ashok Gupta सर को स्पेशल थैंक्स इस पूरे अयोजन के लिए.... 

टी के मारवाह

हमें तो लूट लिया ......!..........बाकलम ...दोस्तों ...जब हम घर से दूर किसी आयोजन खास करके मनपसंद कला साहित्य संगीत रंगमंच के कार्यक्रम मैं जाते हैं जहाँ हम इन छेत्रों के दिग्गजों से मेल मुलाकात का सहज अवसर प्राप्त करते हैं ...तो तीन दिन के आयोजन का समय कब पंख लगा कर कब फुर्र्र्र हो जाता हे की पता ही नहीं चलता ...ऐसे ही हाल मैं संपन्न हुए " बीकानेर आर्ट्स एंड लिटरेचर फेस्टिवल " जो १ नवम्बर से ३ नवम्बर तक बीकानेर मैं हुआ ...दोस्तों कार्यक्रम की विस्तृत विवेचना मेरे दुसरे साथी करेंगे ही ...मैं यहाँ सिर्फ स्वादिष्ट व्यंजनों मैं सजावट का कार्य ही करना चाहूँगा ...आचार्य तुलसी जी के पवित्र समाधी स्थल पर कार्यक्रम का आयोजन ही इसकी सफलता का निर्णय कर चूका था ...शेष सिलसिलेवार सुनियोजित क्रमबद्ध कार्यक्रम था ...जिसमें हिंदी साहित्य के तमाम दिग्गज प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ,नरेश सक्सेना ,पदमश्री चंद्र प्रकाश देवल ,नंद भारद्वाज ,डॉ दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ,ब्रज रत्न जोशी,दीपक कबीर ,द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ,बाल चंद तिवारी,मधु आचार्य ...रंगमंच की प्रख्यात नादिरा बब्बर अपनी टीम सहित उपस्तिथ थीं ...तथा और भी कई कला के हस्ताक्षर अपनी कला सहित उपस्तिथ थे | और सही माने मैं सब अपनी संस्कृति के स्वयं अतिथि थे ...तीन दिन बहुत कुछ कहा गया ,बहुत कुछ सुना गया ,बहुत कुछ देखा गया ...कुछ आत्मसात भी किया ...इतने बड़े पहले प्रयास के इस विराट आयोजन मैं कुछ कुछ (तकनीकि ) हलकी फुलकी शरारतें भी रहीं पर आयोजन की गूँज इतनी रही की ये शरारतें उभर नहीं पायीं ...या यूँ कहें कहा ...सुना...देखा...के साथ कुछ सहा भी गया ...पर किसी आह के साथ नहीं ...हर तरफ वाह के साथ ...! इस शानदार आयोजन की माला के धागा थे नन्द भरद्वाज ,सुभाष गुप्ता ,नवनीत पाण्डेय ,सईद अय्यूब ...गेंदे के ढेर सारे फूल मैं हम सब थे ...बीच मैं सुन्दर गुलाब के रूप मैं श्री शिवरतन अग्रवाल ( फन्ना बाबु ) थे देश विदेश मैं सुप्रसिद्ध बीकाजी नमकीन के मालिक ...और इस मुकम्मल माला की मुख्य गाँठ श्री अशोक गुप्ता थे तो सह गाँठ उनकी सहयात्री श्रीमती सावित्री गुप्ता थीं ...जिनकी सहभागिता के बिना ये संभव नहीं था | शनिवार का दिन विभिन्न चर्चाओं परिचर्चाओं पेंटिंग्स कला के नाम रहा ...तो दूसरा दिन रविवार राजस्थान की प्रसिद्द करणी माता के मंदिर के दर्शन से शुरू होकर शाम को डेजर्ट सफारी ( उस दिन ऊंट किसी अन्य कार्यक्रम मैं गए हुए थे ) तो फिर कई कमांडर शक्तिशाली जीपों मैं सवार हो रेत के विशाल टीलों पर कभी ऊपर तो कभी नीचे कभी दायें तो कभी बाएं कुशल ड्राइवरों द्वारा हेरत अंगेज संचालन उत्तेजना रोमांच से भरे वे क्षण सदेव जेहन मैं अमिट हो गए ...उसके बाद उस छोटे रेगिस्तान मैं शीतल पानी गरमागरम पकोड़ों के साथ तत्ती तत्ती चाय काफी ...सारी थकान रेत की नाईं ढह चुकी थी ...फिर हुआ दो घंटे का मंत्रमुघ्ध परीलोक का आभास देने वाला चारों तरफ उडती रेत के बीचों बीच जंगल मैं मंगल... रंग बिरंगी अत्याधुनिक लाइटों से चकाचौंध और इन सब से ऊपर राजस्थान के सुप्रसिद्ध ( विदेशी कोक स्टूडियो ) से जुड़े कलाकार कुतले खान और उनके साथियों का शानदार गायन क्षण भर तो ऐसा लगा जैसे अपनी मोहक भव्य प्रस्तुति से कुतले खान ने वहां सुनने वालों का कत्ले आम ही कर दिया ...पूरे दो घंटे तक दो सौ लोगों का हुजूम मानों किसी और ही दुनियां जहाँ सिर्फ और सिर्फ ...आनंद ही आनंद पसरा हुआ था | और ये निद्रां टूटी तो सब रंगमंच की दुनियां मैं थे ...दुलारी बाई ...इसका मंचन ये भी दो घंटे तक चला बहुत शानदार प्रस्तुति हँसते हँसते बेहाल ...क्या रविवार था जिन्दगी का तीन घंटे का रोमांच दो घंटे आनंद ही आनंद और फिर दो घंटे हँसना ही हँसना ...पूरे सात घंटे ...वाह और वाव्वाही के | तीसरे दिन यानि सोमवार बहतरीन काव्य परिचर्चा ...सिनेमा और हम...पर बेहतरीन सार्थक मुठभेड़ इसमें एक पहलवान जयपुर के डॉ दुर्गा प्रसाद अग्रवाल तो दुसरे पहलवान बिलासपुर के श्री द्वारिका प्रसाद अग्रवाल तो तीसरे पहलवान थे इंदौर के राकेश मित्तल वार्ता बहुत सटीक अपनी नाम की गरिमा के अनुरूप सार्थक रही ...लेकिन अपूर्ण रही ...चूँकि समय कम रहा इसे कम से कम ज्यादा समय दिया जाना चाहिए था ...खेर उसके बाद कुछ चुनिन्दा फूलों को राजस्थानी पगड़ी पहना कर सम्मान से नवाजा गया ...उसके बाद नादिरा बब्बर के साथी कलाकारों द्वारा चार लघु नाटिकाओं की एकल प्रस्तुति दी गयी जो बेमिसाल रहीं और उसके बाद विदाई वेला यानि समापन | और अंत मै कहना चाहूँगा जिसके बिना दुनिया का कोई भी कार्यक्रम फिर वो भले ही कितना भव्य हो ही नहीं सकता ...भोजन ...बेहद शानदार विभिन्न थीमों के अनुसार स्वादिष्ट सुरुचिपूर्ण एक से एक व्यंजनों ने जैसे पेट को तीन दिन तक अपना बंधक ही बना लिया ...काश दो कान की तरह दो पेट भी होते ...! और चलते चलते ...इतनी सब बेहतरीन कारगुजारियों के कर्ता...ONE MAN ARMY...ASHOK GUPTA को आज प्रणाम नहीं नमन करने को दिल करता हे ...धन्यवाद

कंडवाल मोहन मदन

देहरादून से आए समीक्षक कंडवाल मोहन मदन के शब्दों में,"बीकानेर साहित्य कला उत्सव 2014 ; पधारो म्हारो देश के अम्बर तले मरू चांदी बिखेरते नीला स्कार्फ पहने पंच्कन्यायें नृत्ये कत्थक में घुला साहित्य; सूफी गायन का और लोकगायन का वैश्वीकरण या बाजारीकरण तथा दुलारीबाई की व्यथा; साहित्य_नाटक _कहानी _सिनेमा _संगीत _ध्रुपद _सरोद ~सितार जुगलबंदी _नादिरा जी के नाटकों का वाचन_ हेरिटेज वाक्_ करणी माँ और मूषकाधिराज_ आत्मीयता सहजता का संगम_ लज़ीज व्यंजन पकवान_अदृश्य नमकीन_ किताबें_कवि-गोष्टियाँ_ अनकही बतकही _ लोक काव्य संगीत__ चित्रकला की जीवन्तता_मुशायरा _मरुता सफारी_तुलसी समाधि के सानिध्य में असीम शांति और तन मन से जुटकर काम करते आयोजक कवि; लेखक; चित्रकार ; डायरी भरवाते मित्र बस में गोष्ठी में खाते जाते आते गाते कमाल की जीवटता संग_कुशल मंच संचालक पगड़ी पहनते सँभालते और जादू से अदृश्य करते साथ -साथ........तो क्या यह सृजन उत्सव था या अपने घर का अशोक उत्सव.? अंतस में बैठी हैं जैन मुनि का प्रासंगिक उदबोधन, आदरनीय नरेश सक्सेना जी की बोलती कवितायेँ,श्री पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की बेबाकी तथ्यपूर्ण विद्वता भरे बयान -टिप्पणियाँ, नादिरा जी के रेडियो पास दर्शन से नाटक से अभिनय, कल्पित जी और निजाम जी की शायरी, सुमन जी अरुण देव गांधी जी और स्वर्ण गीतिकाव्य के कविता अंश, और भी बहुत कुछ मसलन द्रौपदी प्रथा के बहाने विमर्श और मेरी उगी हुई पूँछ का प्रादुर्भाव तथा अन्तर्धान होना चित्र बहुत हुए अब विस्तृत भोगे अनुभव संग समीक्षात्मक पाठकनामा या रपट शीघ्र ही।

विष्णु तिवाड़ी

जयपुर से आए पत्रकार विष्णु तिवाड़ी ने कहा,"जब तक आप कोई दुःसास नहीं दिखावोगे आपके साहस की पहचान हो नहीं सकती !एक ऐसा ही दुःसास बीकानेर के Ashok Gupta ji ने कर दिखया !बीकानेर आर्ट और सांस्कर्तिक महोत्सव करके !टीम साथ थी ,पर वो हमेशा टीम के आगे और पीछे थे !में अभिभूत हूँ, इस आयोजन से जिसने फेस बुक साथियो को रूबरू करवाया ! माधय्म महत्व पूर्ण होता है हर अच्छी घठना के लिए ! अशोक जी को और उनकी पत्नी जी को जो पूरे समय उनके साथ साथ रहकर, इसको अंजाम तक ले जाने में साथ रही दोनों को बहुत बहुत बधाई !

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

छत्तीसगढ से आए सिनेमाविज्ञ द्वारिका प्रसाद अग्रवाल कहते हैं,"#बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव के अभूतपूर्व आयोजन के के लिए आपको एवं आपके सहयोगियों को असीम बधाई. आपने वह कर दिखाया जो अकल्पनीय था. विविध कार्यक्रमों की बहुरंगी छटा, साहित्यकारों और कलाकारों का अपूर्व समागम और आपके दल-सदस्यों की लगनशीलता अविस्मरणीय है. आपका प्रयास 'फेसबुक' सम

इरा टाक

युवा चित्रकार व कवयित्री इरा टाक कहती है,"कुछ अनुभव इतने सुन्दर होते हैं कि निःशब्द कर देते हैं...बीकानेर कला और साहित्य महोत्सव में भाग लेने के बाद गृह नगर जयपुर वापसी ...

अशोक गुप्ता

और अंत अशोक गुप्ता के इस आत्मीय धन्यवाद ज्ञापन वाले उद्बोधन के साथ

मित्रों बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव में फेसबुक की दुनिया से जितने सितारे बीकानेर के इस उत्सव में भागीदारी करने पधारे उन सबको मेरा सलाम और आदाब..एक कहावत है कि जब हम यात्रा करते हैं उस समय हम वास्तव में यात्रा नहीं कर रहे होते हैं लेकिन यात्रा समाप्त होने के पश्चात घर लौटने के बाद वह यात्रा कई दिन तक हमारे भीतर चलती रहती है. यकिन मानिए यह यात्रा आने वाले कई दिनों तक आनंद और बैचैनी का एहसास कराती रहेगी. आप और हम सबने मिलकर यह तो कम से कम साबित कर ही दिया कि बड़े से बड़ा काम भी अगर नियत साफ़ हो और मन में विश्वास हो तो पूरा किया जा सकता है. मैंने और मेरी टीम ने व्यक्तिगत रूप से अपनी तरफ़ से बहुत कुछ सार्थक करने का प्रयास किया और काफ़ी कुछ चीज़ों में हम असफल भी रहे लेकिन पहले ही दिन से जितने भी अतिथि पधारे थे वह सब के सब स्वयं होस्ट के रूप में बदल गए. और यही इस उत्सव का हासिल है. आयोजनों में बहुत कम ऐसा देखने को मिलता है जब मेजबान और मेहमान में फर्क खत्म हो जाता है काफ़ी कमियों के बावजूद किसी ने भी किसी कमी को लेकर किसी तरह का कोई वाद-विवाद नहीं किया. बहुत से लोगों को हम वह सुख-सुविधाएं मुहैया नहीं करवा पाए जिसके वह हकदार थे बहुत से मित्रों को हम मंच पर भागीदार नहीं बना पाए और उस सबके बावजूद आप सबने जो सयम बरता और जो अभूतपूर्ण सहयोग दिया वो इस उत्सव की उपलब्धि रही.

मित्रों मैं आपको यकिन दिला रहा हूँ बहुत जल्द अगला कार्यक्रम होगा उसमें हम हमारी काफ़ी कमियाँ सुधारने का प्रयास करेंगे. अगला कार्यक्रम कब कहाँ और किसके सानिध्य में होगा इसकी जानकारी हम आपको नवंबर के अंत तक देंगे. किसी मित्र को इस संदर्भ में कोई सुझाव देना हो वो मेरे इन्बोक्स में दे सकते हैं..अगली पोस्ट में मैं उन सभी अतिथियों का पर्तिसीपेंटों का उन सदस्यों का और उन मित्रों का जिनके बिना यह प्रोग्राम असंभव था उन पर चर्चा करूँगा .....

बीकानेर कला और साहित्य उत्सव को समाप्त हुए तीन दिन हो गए। आयोजन की अभूतपूर्व सफलता के लिए लोगों की बधाइयों, टिप्पणियों और आलोचनाओं का मैं बेहद ही आत्मीयता से स्वागत करता हूं। साथ ही साथ अपनी आयोजन समिति के सदस्यों एवं इस उत्सव से जुड़े सभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करता हूं। दोस्तों, जैसा कि पहले भी मैंने आपसे यह साझा किया है कि मैं कोई आयोजक नहीं हूं, कोई बड़ा कलाकार नहीं हूं, परन्तु एक छोटा सा व्यवसायी और बहुत बड़ा कलाप्रेमी हूं। इस उत्सव के संबंध में कई तरह की बातों के बीच सबसे अहम् और सकूनदेह बात यह कि आयोजन की अवधारणा पूरी हुई। बीकानेर की धरती पर आये लोगों का हमने खुले दिल और आत्मा से स्वागत किया। लोगों ने भी हमारी आत्मीयता को समझा और आयोजन में शामिल विभिन्न तरह के कार्यक्रमों को एक अनोखी और सुन्दर रूप- रेखा देने का काम किया।

सही मायने में इस आयोजन के पीछे फेसबुक की दुनिया के दोस्तों को एक दूसरे से जोड़ना था। इस आयोजन के शुरू में ही इस बात का हम सभी ने ख्याल रखा था कि यह उत्सव कुछ इस तरह से हो जो एक दूसरे से जोड़े, एक दूसरे के लिए लाभकारी और कला और साहित्य की दुनिया में समानता के भाव को जागृत व प्रबल बना सके। हमारे द्वारा तैयार इवेंट कैलेन्डर में भी बड़े और छोटे का कोई भेद जाहिर करने वाली बात नहीं थी। इस बात के लिए मैं प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल, श्री नरेश सक्सेना, श्री शीन काफ़ निज़ाम, श्री नंद किशोर आचार्य, श्री चंद्र प्रकाश देवल, श्री नंद भारद्वाज, श्री शिवरतन अग्रवाल सहित अन्य विशिष्ट लोगों का शुक्रगुज़ार हूं जो बिना भेदभाव के कार्यक्रम में आए। लोगों के दिलों में अपने व्यवहार और सहृदयता के चलते अपने व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण छाप छोड़ गए।

प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल जी की विद्वता और नम्रता का मैं शुक्रगुजार हूं कि जब मेरे पास आयोजन की कोई रूप-रेखा भी नहीं थी उत्सव से जुड़े, वह भी किसी विशिष्ट अतिथि के रूप में नहीं। उन्होंने इस बात का भी वादा लिया था कि वह इस आयोजन में एक दर्शक के रूप में शामिल होंगे, कुछ कहने की बजाय सुनना पसंद करेंगे। लेकिन हम अपना वादा नहीं पूरा कर पाए। जिसकी वजह से आयोजन में सम्मलित लोगों को अभूतपूर्व लाभ हुआ। इसी तरह श्री नरेश सक्सेना, श्री शीन काफ़ निज़ाम, श्री नंद किशोर आचार्य, श्री चंद्र प्रकाश देवल, श्री नंद भारद्वाज, श्री शिवरतन अग्रवाल सहित अन्य विशिष्ट लोगों से भी कार्यक्रम में उपस्तिथ लोगों ने बहुत कुछ हासिल किया। अपने समस्त दोस्तों को मैं बताना चाहता हूं विशिष्ट व्यक्ति को विशिष्टता जाहिर करने की आवश्यकता नहीं होती। उसका व्यक्तित्व खुद बोलता है। यहां पर आये तमाम बुद्धजीवियों और मनीषियों ने भी यही किया।

अब यह आयोजन पूरा हो चूका है, लेकिन आपको मैं बताना चाहता हूं कि यह मेरी महज़ एक पहल थी। इस तरह की पहल हम आगे भी समय समय पर करते रहेंगे। साथ ही साथ इस बात की उम्मीद भी है कि कुछ और दोस्त आगे आएंगे, इस तरह के आयोजन भारत के विभिन्न हिस्सों में करते रहेंगे और हमारी आभाषी दुनिया की आत्मीयता वास्तविकता की इबारत लिखने में कामयाब होती रहेगी।

प्रस्तुति -नवनीत पाण्डे